मूल पाठOriginal Text
- श्रीराम की आज्ञा - दोहा ७७ -
पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु।
गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु॥
- मुनियों का प्रश्न -
बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तपु भारी॥
देखहु मुनि अबिबेकु हमारा। चाहिअ सदा सिवहि भरतारा॥
- ऋषियों की परीक्षा - दोहा ७८-७९ -
निर्गुन निलज कुबेष कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली॥
अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख मागि भव खाहिं॥
- पार्वती का अटल संकल्प - दोहा ८० -
महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।
जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥
जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥
तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू॥
- ऋषियों का आशीर्वाद - दोहा ८१ -
तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु।
नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु॥
भावार्थMeaning
श्रीराम की आज्ञा: प्रभु श्रीरामजी ने सप्तर्षियों से कहा - तुम पार्वती के पास जाकर उनके प्रेम की परीक्षा लो, फिर हिमाचल को प्रेरित करके उन्हें घर भिजवाओ और उनका संदेह दूर करो।
Rama's Command: Lord Rama said to the Seven Sages: Go to Parvati and test the depth of her love; then have Himachal bring her home, and put an end to her doubt.
मुनियों का प्रश्न: मुनि बोले - हे शैलकुमारी! सुनो, तुम किस कारण इतना कठोर तप कर रही हो? पार्वतीजी ने उत्तर दिया - हे मुनियों! मेरा यह अज्ञान ही देख लीजिए कि मैं सदा शिवजी को ही पति के रूप में चाहती हूँ।
The Sages' Question: The sages asked: O daughter of the mountain, for what reason do you undertake such severe penance? Parvati replied: O sages, behold my folly - I wish only for Shiva as my husband, always.
ऋषियों की परीक्षा: परीक्षा लेते हुए ऋषि बोले - नारद के वचनों पर विश्वास करके तुम ऐसा पति चाहती हो जो स्वभाव से उदासीन, निर्लज्ज, बुरे वेष वाला, नरकपालों की माला पहनने वाला, कुलहीन, घर-रहित, नंगा और साँप लपेटे रहने वाला है। अब उन्हें कोई चिंता नहीं, भीख माँगकर खाते हैं और सुख से सोते हैं।
The Sages' Test: To test her resolve, the sages said: Trusting Narada's words, you desire a husband who is by nature indifferent, shameless, ill-attired, wearing a garland of skulls, without lineage or home, unclothed, and draped in serpents. He has no cares now - he begs for food and sleeps at ease.
पार्वती का अटल संकल्प: ऋषियों ने कहा - मान लो महादेव अवगुणों के घर हैं और विष्णु सद्गुणों के धाम, पर जिसका मन जिसमें रम गया, उसे तो उसी से प्रयोजन है। पार्वतीजी ने दृढ़ता से कहा - करोड़ों जन्मों तक मेरा यही हठ रहेगा - या तो शिवजी को वरूँगी, नहीं तो कुँवारी ही रहूँगी। मैं नारदजी के उपदेश को नहीं छोड़ूँगी, चाहे स्वयं महेश्वर सौ बार भी कुछ और कहें।
Parvati's Unshakeable Resolve: The sages said: Granted, Mahadev is a home of faults and Vishnu the abode of all virtues - but wherever the mind has settled, that alone matters to it. Parvati declared with firm resolve: For a hundred million births this shall be my vow - I will marry Shiva, or remain unmarried forever. I will not abandon Narada's teaching, even if Maheshwar himself says otherwise a hundred times.
ऋषियों का आशीर्वाद: पार्वतीजी का अटल प्रेम देखकर मुनि बोले - आप माया हैं और शिवजी स्वयं भगवान हैं, आप दोनों ही समस्त जगत के माता-पिता हैं। यह कहकर मुनि पार्वतीजी के चरणों में सिर नवाकर चले, उनके शरीर बार-बार पुलकित हो रहे थे।
The Sages' Blessing: Seeing her unshakeable devotion, the sages said: You are Maya, and Shiva is Bhagwan Himself - together you are the mother and father of the entire universe. Saying this, the sages bowed their heads at Parvati's feet and departed, their bodies thrilling again and again with joy.