मूल पाठOriginal Text
भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला, कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी, मुनि मन हारी, अद्भुत रूप बिचारी॥
लोचन अभिरामा, तनु घनस्यामा, निज आयुध भुज चारी।
भूषन बनमाला, नयन बिसाला, सोभा सिंधु खरारी॥
कह दुइ कर जोरी, अस्तुति तोरी, केहि बिधि करौं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना, वेद पुरान भनंता॥
करुना सुख सागर, सब गुन आगर, जेहि गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी, जन अनुरागी, भयउ प्रगट श्रीकंता॥
ब्रह्मांड निकाया, निर्मित माया, रोम रोम प्रति लागी।
जहँ तहँ रघुनाया, धरहिं सरीरा, सो आनंदकंदा॥
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं, ते न परहिं भवकूपा।
यह बचन आदर सहित सुनत नर, जन्म जन्म पावत भूपा॥
भावार्थMeaning
छंद १–२: कृपालु, दीनदयालु प्रभु प्रकट हुए। उनके मेघ-श्याम शरीर, चार भुजाओं में अपने आयुध, नयन अभिराम — यह देखकर माता कौसल्या हर्षित हुईं।
Stanzas 1–2: The compassionate Lord appeared. His cloud-dark body, four arms bearing His weapons, enchanting eyes — seeing this, Mother Kausalya was overjoyed.
छंद ३: माता दोनों हाथ जोड़कर पूछती हैं — हे अनंत, मैं तुम्हारी स्तुति कैसे करूँ? तुम माया, गुण और ज्ञान से परे हो, वेद-पुराण जिनका वर्णन करते हैं।
Stanza 3: With folded hands, the mother asks — O Infinite One, how shall I praise you? You are beyond maya, the gunas, and knowledge, as the Vedas and Puranas declare.
छंद ४: करुणा और सुख के सागर, समस्त गुणों के आगार, जिन्हें श्रुतियाँ और संत गाते हैं — वही श्रीकंत अपने भक्तों के लिए प्रेमवश प्रकट हुए।
Stanza 4: Ocean of compassion and joy, treasure of all virtues, praised by the Vedas and saints — that same Lord appeared, drawn by love for His devotees.
छंद ५–६: ब्रह्मांड की माया रोम-रोम में है। जहाँ-जहाँ रघुनाथ शरीर धारण करते हैं, वहाँ आनंद की सृष्टि होती है। जो इस चरित को गाते हैं वे संसार-कूप से मुक्त होते हैं।
Stanzas 5–6: The universe of maya is present in His every pore. Wherever Raghunatha takes form, bliss is created. Those who sing this narrative are freed from the pit of worldly existence.